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Parliament election 2019

चुनाव 2019 बहुत सारी विशेषताओं के साथ अतिवादी मानसिकता का भी भविष्य के लिए उदाहरण बनेगा। इस चुनाव में परिणाम का आंकलन बहुत ही कठिन है। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यह कि चुनाव निम्न कारणों को मुख्य बिंदु बनाकर लड़ा जा रहा है।

1. यह चुनाव मोदी और अन्य दलों के बीच लड़ा जा रहा है,
2. राजनीतिक दलों की भूमिका को मानें तो चुनाव भाजपा और महागठबंधन के मध्य हो रहा है,
3. पहली बार चुनाव हिन्दू मुस्लिम न होकर यह चुनाव हिंदुत्व और तथाकथित प्रगतिशीलता के बीच प्रचारित किया जा रहा है,
4. पहली बार चुनाव राष्ट्रीयता और तथाकथित व्यक्तिगत अधिकारों के बीच माना जायेगा
5. प्रसाशनिक सुधार और सामाजिक कल्याण की भूमिका के बीच की लड़ाई के लिए दिखाया जा रहा है

ये सारे मुद्दे भारतीय राजनीति के लिए नये नही है लेकिन इसके पहले कभी प्रमुखता से नहीं आया। सामाजिक सरोकार और रोजगार से अलग होते हुए विकास औऱ गरीबी चुनावी प्रचार से गायब हैं। गाँव और सड़क लोगो की सोंच से इतना दूर आ चुके है कि अब कभी भी राजनीतिक का अंग नही बन पाएंगे। वंशवाद और भ्रष्टाचार की राजनीतिक रूप से स्वीकार कर लिया गया ह। विकास और औद्योगिक प्रगति, चुनाव से बाहर होना वैश्विक कूटनीति का प्रभाव है या भारतीय राजनीतिक लोगो की राजनीति का अंग कह पाना मुश्किल है। हर व्यक्ति दूसरों को देखकर मुस्करा रहा है। समझने की जरूरत है कि वह अपनी सफलता पर मुस्कराहट है या दूसरे के मन की बात जानने के कारण, कहना मुश्किल है।

हर मतदाता पूरे नशे में है। किसी भी भाजपा या मोदी समर्थक से बात करिए तो वह पूरी तरह 350 संसदीय क्षेत्रों में विजय का दम भर रहे हैं। विरोधी बराबर के जोश से इतनी ही जगह हराने की बात कर रहे हैं। मोदी जी का काशी में नामांकन पूर्व रोड शो उनके जोश और जीत के लिए आस्वस्त दिखा रहा है तो चुनाव आयोग का उनके प्रति रवैया उनके विस्वाश को अतिविश्वास में परिवर्तित कर रहा है। अंतिम चरण के चुनाव प्रचार के बाद मोदी जी की केदारनाथ यात्रा एक बार फिर मोदी विरोधी मानसिकता को भ्रमित कर रही है तो चुनावी विश्लेषण में कांग्रेस को चर्चा से बाहर कर रही है। यह भी भविष्य के प्रति भाजपा का अतिउत्साही कदम है। चुनाव प्रचार मे भाजपा का अपने नेताओं के साथ अटल जी को भी हटाना भी एक राजनीतिक भूल है।

किसी भी चुनाव विश्लेषण में निष्पक्ष न होने के सैंकड़ों कारण, वर्तमान चुनाव के उदाहरण हो सकते हैं। नमो टीवी का चलना हो या राफेल पर राहुल गांधी का अतिविश्वास। राष्ट्रीय मुद्दों को राष्ट्रीयता की भावना से जोड़कर जितना भाजपा की सफलता के लिए प्रमाण देता है उतना की राहूल गांधी का विश्वास केजरीवाल और अखिलेश से चुनावी गढ़बन्धन को नकार कर कोंग्रेस की पुनः वापसी का संकेत मिल रहा है। कांग्रेस का चुनाव संचालन बहुत ही सधे हुए अंदाज में अपने आप को स्थापित कर रहा है, तो भाजपा का विश्वास अपनी विजय के प्रति आश्वस्त दिख रहा है। चुनावी विश्लेषण उनकी ज्ञान छमता के बजाए या तो मोदी को नकार रहा है या स्वीकार कर रहा है। मोदी की विशालता हर विश्लेषक को उनके पक्ष मे रही है तो कन्हैया का विश्वास मोदी की हार में विश्लेषण करने के लिए हर विचारक की हिम्मत बढ़ा रहा है। अगर अतिवादी होकर बात कही जाये तो मोदी 335 से 350 सीटों पर जीत रहे है और कोंग्रेस 165 पर जीत रही है। मोदी जी की विशालता पर विश्वास किया जाये और देश पर विश्वास अपने तरीके से करने वालों पर संदेह न किया जाए तो मोदी अपने समर्थकों के साथ लगभग 300 से ऊपर जीत रहे है।

ये सारी बाते मोदी पक्ष में जितना विस्वास दिखा रही है उतना ही राहुल गांधी का पत्रकारों से मिलना औऱ मोदी जी का पत्रकारों से प्रश्न न लेना उनको हार की तरफ ले जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र का यह पहला चुनाव है जहां लोग आपस मे बात करना नहीं चाह रहे हैं। अन्तिम चरण में अब लोग 23 मई को आने वाले परिणाम पर सारी चर्चा को खत्म कर रहे हैं। यह उदासी उतनी ही घातक है जितना अपने नेता को वोट देने को देशभक्ति कहना।

वर्तमान चुनावी माहौल की एक बात और इस चुनाव की विशेष बात मानी जायेगी वो है राहुल गांधी के व्यक्तित्व को नकारने में लोग बढ़चढ़ के भाग ले रहे है। एक सामान्य व्यक्ति और बच्चे भी राहुल गांधी को अपरिपक्व और असक्षम मान रहे है। राहुल गांधी की राजनीतिक कुशलता पर विचारकों के विचार कुछ भी हो सकते है लेकिन हमारा मत भीन्न है। राहुल गांधी को परिवार के सारे लाभ मिले जी भारतीय उपमहाद्वीप के सच है। उन्होंने समय के अनुसार अपने आपको उसके लायक बनाया है। विरोध की राजनीति से निकलकर भीड़ की आवाज बनने की कोशिश कर रहे हैं। इसी रणनीति से कर्नाटक और राजस्थान में वो सफल हुए। अंतिम चरण के चुनाव मे अपने आप को स्थापित करने मे सफल बि हुए। अगर समान परिणाम की बात की जाए तो वह सबसे बडा दल बनकर अगर कांग्रेस आती है तो हमें आश्चर्य नहीं होगा। यह निश्चित रूप से सभी आलोचनाओं के साथ विपरीत परिस्थितियों में भी राहुल गांधी का संयमित होना ही भाजपा की हार का कारण बन सकता है। भाजपा 2004 की हार से सीख लेने के बजाय वही गल्ती फिर कर रही है। मोदी जी अपने ऊपर हुए अन्याय की भूलकर वही गल्ती कर गये जो कांग्रेस ने उनको बदनाम करके की। भारतीय मतदान में जितनी असंयमित भीड की भूमिका होती है उतनी ही व्यक्तिगत सवेंदना। राहुल गांधी को इसका फायदा मिल सकता है।

इन सभी बातों के बाद भी अगर भरतीय राजनीति और लोगों की मानसिकता के साथ आंकलन की किया जाये औऱ पूर्व में हुए चुनावी उठापटक और जाति और धर्म का प्रभाव पूरी तरह स्वीकारते हुए योगेंद्र यादव जैसे स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारा और भारतीयों की वैचारिक विश्लेषण का प्रभाव जरूर इस चुनाव को भी प्रभावित करेगा। चुनाव परिणाम कुक्ष ऐसे होंगे

A: भाजपा 190 से 205
B: कांग्रेस 137 से 155
C: अन्य भाजप समर्थक दाल 25 से 40
D: बांकी सीट अन्य सभी को जाएंगी जैसे तृणमूल, वाम दल, सपा, बसपा आदि को जायेंगी

चुनाव बाद पूरी संभावना है कि सपा और बसपा भाजपा को समर्थन दे दे और सरकार बन जाये। या फिर सभी छोटे दाल मिलकर कॉग्रेस के समर्थन से किसी दक्षिण भारत के नेता को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश करें। एक औऱ संभावना है कि शरद पवार भाजपा के समर्थन से प्रधानमंत्री बन जाये या जयराम रमेश के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस प्रयास करे।

यह विश्लेषण noIDEAknow team का विश्लेषण हैं औऱ किसी भी राजनीतिक विचारधारा औऱ पार्टी से मतलब नहीं रखता है।