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राम लला का न्याय – एक एतिहासिक फ़ैसला

रामजन्मभूमि पर आये आदेश ने एक बार फ़िर से इस बात को साबित कर दिया कि न्याय व्यवस्था साक्ष्यों पर निर्भर करती है। किसी भी व्यक्ति या व्यवस्था द्वारा किया गया अन्याय पर न्यायालय द्वारा फैसला स्थापित संविधानिक अधिकारों के आधार पर ही होगा। रामजन्मभूमि पर जब से बहस शुरू हुई, केंद्र में बाबर द्वारा मस्जिद बनाने की बात से ही शुरू होती थी। इस बात का व्यवस्था या सरकार द्वारा न माना जाना सामान्य सोंच पर निर्भर लोगों को समझ ने नही आ रही थी। इस सत्य को स्वीकार करना या अस्वीकार करना व्यक्ति के संस्थागत और धार्मिक हितों पर निर्भर करता है।

सरकार द्वारा कोई भी कदम राममंदिर कर पक्ष में न लेने का केवल एकमात्र कारण, यथा स्थिति को बनाने का प्रयास जो सरकार का प्रथम दायित्व है। हिन्दू और मुस्लिम पक्षकारों का अपना अपना विश्लेषण था। हिन्दू राम के जन्म को आधार को अपना अधिकार बना रहे थे और मुस्लिम अपनी उपस्थिति को। मुस्लिम इस बात और जोर दे रहे थे कि वहाँ पर मस्जिद है। मस्जिद में मुसलमानों का अधिकार है। ये दोनों ही बातें सतप्रतिशत सही थीं।

कानून की लड़ाई में अधिकार और अधिकारों का स्रोत महत्वपूर्ण होता है। रामजन्मभूमि के विवाद में अधिकतर पक्ष अपने अधिकारों के लिये अडिग थे। मुस्लिमों के पास मस्जिद थी और हिंदुओं के पास मंदिर। दोनों ही बातों का माननीय न्यायालय ने माना भी है।   यह भी स्थापित किया है कि यह विवाद पूरी तरह आस्था पर है और संविधान में आस्था पर कोई अधिकार नहीं दिये गये हैं। पहले ही चरण में न्यायालय ने यह कह भी दिया था। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह हुई कि न्यायालय पूरी तरह यह विश्वास बनाने में सफल रहा कि यह विवाद तार्किक नही हो सकता क्योंकि हर पक्ष में धार्मिक विश्वास प्रमुख होता जा रहा है। सभी पक्ष अपनी अपनी आस्था को स्थापित करना चाह रहे थे। संविधान इसके लिए कोई जगह नही देता है न देता था।

सरकार या न्यायालय के लिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि जिसका भी मालिकाना हक हो उसी के अधिकार को स्थापित होने पर ही उसे अधिकृत किया जा सकता है। इसमें कोई भी पक्ष या व्यक्ति अपने आप को स्थापित कर पाने में असमर्थ था। सम्भवतः, राम लला को पक्षकार बनाने के मूल में और देवताओं की उपस्थिति को स्वीकार करने के मूल में यही बात रही होगा।

यह भी यहाँ महत्वपूर्ण था कि मस्जिद और मंदिर, दोनो के ही प्रमाण अपनी अपनी जगह स्थापित थे। कोई भी पक्षकार अपने आप को स्थापित नही कर पा रहा था इस हद तक कि उसका मालिकाना हक सिद्ध हो सके। दोनों जितना अधिकार रखते थे उतना अधिकार वो तार्किकता में सिद्ध नही कर पा रहे थे।

सरकारी संस्था भारतीय पुरातत्व विभाग साक्ष्य दिखा रहा था जहाँ मंदिर था तो मस्जिद भी थी। वर्तमान में कोई भी इस परिवर्तन को प्रमाणित नही कर पा रहा था न ही अपने आप को अधिकृत उत्तराधिकारी सिद्ध कर पा रहा था। यही स्थिति थी जहाँ पर कानून बनाने वाले या व्यख्या करने वाले महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। संसद के अधिकार क्षेत्र से बात बाहर आ गई थी, राजनीतिक दल और व्यक्ति दोनों ही इस स्थिति में कुछ भी करने की स्थिति में नही थे। केवल न्यायालय एकमात्र रास्ता था।

न्यायालय ने संशय की स्थिति को समझा। तार्किक होकर अपने निर्णय में सरकार को अधिकार दिया। सरकार किसी भी काम को अपने अनुसांगिक विभाग से ही करा सकती हैं। ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया। भगवान यानी रामलला को व्यक्ति मानकर उनका अधिकार दिया। मस्जिद के माध्यम से जो एक दूसरा पक्ष आया उसका भी होना वर्तमान में प्रमाणित हुआ औऱ मस्जिद बनाने के लिये सुविधाओं को देने के लिये सरकार को आदेशित किया। इस निर्णय की सबसे महत्वपूर्ण बात, अधिकांश, धार्मिक स्थान और कार्यक्रम एक व्यक्ति या संस्था द्वारा संचालित किये जाते हैं। समय के साथ वो इसे अपना अधिकार समझने लगते है। न्यायालय ने यह पूरी तरह इस अनाधिकृत परिपाटी को तोड़ने में कामयाब रहे है। हर पक्षकार को न्यायालय ने अधिकृत करने से मना किया और सरकार जो आम आदमियों का प्रतिनिधित्व करती है। सरकार को नियमानुसार, संस्थाओं की संवैधानिक परिपाटी को स्थापित करने के लिए आदेशित किया। एक और सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पहली बार सामुहिक आस्था जो धर्म को भी स्थापित करती है प्रमाणित किया है। रामलला को मंदिर का पक्षकार मानकर सारे अधिकार देना एक ऐतिहासिक निर्णय है। यह निर्णय आस्थाओं की संवैधानिक स्वीकृति के साथ संस्थागत नियंत्रण के साथ सामाजिक परिप्रेक्ष्य में पूरी तरह स्थापित करने में सफल रहा है।

यह निर्णय यह पूरी तरह स्थापित करता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में न्यायालय संविधान और संसद द्वारा परिभाषित नियमों के अनुसार सर्वोच्च है और न्यायमूर्ति इसमें सक्षम हैं।