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नागरिकता संसोधन बिल : एक राजनीतिक महत्वकांक्षा

किसी भी व्यक्ति का जन्म लेना एक प्राकृतिक दुर्घटना के अलावा कुछ नहीं है। यह दुर्घटना किसी को जिंदगी भर सारी सुविधाओं के साथ जीने का माध्यम देती है तो किसी को हर दिन और हर घंटे संघर्ष की चुनौती देती है, किसी को सारी स्वतंत्रता के साथ जीने का हक देती है तो किसी को छोटे से हक के लिए जूझने को मजबूर करती है, किसी को अपने अनुसार जीवन जीने का हक देती है तो किसी को दूसरे की दया दृश्य में जीने के लिए छोड़ देती है। यह सब व्यक्ति को उसके जन्मस्थान, परिवार, धर्म आदि के अनुसार होता है। कोई भी व्यक्ति इस बात को चुनने का अधिकार नही रखता कि उसे इस परिवार या जगह या धर्म में पैदा किया जाये। इस मृत्यु लोक में हर जन्मे व्यक्ति को समाज अपने जन्म के अनुसार स्वीकार करना पड़ता है। उसका पालन पोषण उसके धर्म और परिवार के संस्कारों के साथ मां बाप की क्षमता वाली सुविधाओं के अनुसार ही जीना होता है। कुछ लोग अपने आप को परिवार और समाज की सीमाओं के अनुसार बांध लेते हैं और जिंदगी को दुनिया के बनाये नियंत्रण वाले संसार मे जीते रहने में ही सुख और शांति पाते है। ऐसे व्यक्ति सामान्यतः बिना किसी समस्या के जीवन जीते हैं। मानवीय संसार में संसाधनों से लेकर सामाजिक स्वीकृति सब अलग अलग होती हैं। हर व्यक्ति जैसे जैसे समझदार होता है दुनियां को अपने अनुसार परिभाषित करने की कोशिश करता है। जब तक परिभाषायें सामाजिक और राज्यों की सीमाओं में रहती है किसी को समस्या नहीं होती परन्तु जैसे कि सीमाओं से बाहर आती है, व्यक्ति और राज्य का अहम जाग जाता है। यह बड़ा ही सामान्य अनुभव है कि व्यक्ति और सरकार दोनो ही समस्या को अपने अनुसार प्रभावित करके जनता को अपने पक्ष मे लेने की कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में मानवीय मूल्यों, धार्मिक संस्थाओं और परिवार के संस्कार रोज आड़े आते हैं। संविधान और संस्कृति को बीच में हर पल लाया जाता है और एन केन प्रकारेण अपनी बात को सच साबित करने की कोशिश होती हैं।

 

स्वार्थ की दुनियां में राज्य की परीक्षा तब होती है जब व्यक्तिगत अधिकार और उसके दायित्वों पर प्रश्न होता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यह और भी कठिन हो जाता है क्यूंकि यह सबसे बडे समुदाय से प्रभावित होता हैं। समूह की जरूरत समय और स्थान के अनुसार बदलती रहती है। लोकतंत्र में मत का लालच इसे और स्वार्थी बना देता है क्योंकि हर सरकार का जीवन काल अधिकतम पांच साल का होता है। वर्तमान सरकार हरदम अपने वोट को अपने पास रखने के साथ ही दूसरी के वोटर को आकर्षित करने का हर प्रयास करती है। सरकार से अपेक्षा होती है कि वो इस प्रकार काम करे कि उसके सारे प्रयास संविधान की सीमाओं में रहें और देश भी वर्तमान की जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य में प्रगतिशील बना रहे। सरकार को अपने प्रयास में कानून व्यवस्था को सुदृड करने के साथ नागरिकों को सुविधा संपन्न बनाने का भी प्रमाण देना पड़ता है।

 

इन प्रयासों में सरकार को विभिन्न कदम उठाने पड़ते हैं। नागरिकता संसोधन बिल उनमे से एक है। सरकार इस बिल को अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए हिन्दू, जैन, बौद्ध, ईसाई आदि को नागरिकता देना चाह रही है। बिल को स्थापित संवैधानिक प्रावधानों के साथ पास किया गया और क्रियान्वित करने की कोशिश की गई। संसद में बिल पास हुआ, पूरी बहस के बाद लेकिन जनता के बीच बहस का मुद्दा नही बना। लोकतंत्र में कोई भी निर्णय बिना जनता के बीच आये तो वह निश्चय ही राजनीतिक महत्वकांक्षी लगने लगता है।

 

इस बिल के पास होने के साथ ही लोगों की प्रतिक्रिया आने लगी। कुछ सामाजिक संघठनो ने इसपर प्रश्न किया। कांग्रेस सहित कुछ दलों ने इसे संविधान विरोधी बताया औऱ संसद से सड़क तक विरोध करने की बात की। इस प्रकार के प्रश्न लोकतंत्र में आना लाज़मी है लेकिन सरकार इन समस्याओं से बच सकती थी अगर इसको संसद से पास कराने से पहले इसपर जनता से भी मत मांग लिया होता।

 

लोकतंत्र में अपनी बात कहने का अधिकार सभी को है चाहे वह राजनीतिक दल हो या व्यक्ति विशेष। बात कहने के तरीकों पर जरूर प्रश्न किया जा सकता है। इसमें सभी को स्वीकार करना पड़ेगा कि दूसरे को उसके द्वारा उपयोग किया गया माध्यम किसी प्रकार की परेशानी न पैदा करे। विरोध प्रदर्शन के लिये सरकार को संयमित रहना पड़ेगा, सरकार के विरोध और राष्ट्र के विरोध में अंतर समझना पड़ेगा। सरकार को विरोध को दबाने में व्यक्ति को मिले अधिकारों का सम्मान करना पड़ेगा। विरोध प्रदर्शन और सरकार का उसको दबाने का प्रयास दोनो ही बहुत ही बृहत धारणा के साथ होने चाहिए। विरोध प्रदर्शन करने वालों को ध्यान रखना पड़ेगा कि सरकार संविधान और नागरिक दोनों की ही संरक्षक है। विरोध प्रदर्शन में यदि ऐसा कोई भी काम होता है जिससे नागरिकों को असुविधा हो, ऐसा कोई भी प्रयास जो अपराध की श्रेणी में आता है नही किया जाना चाहिए। ऐसा होने पर सरकार अपने अनुसार विरोध प्रदर्शन को बंद कराने की कोशिश कर सकती है। यह सरकार के दायित्व के साथ अधिकार भी है। यह समझना बहुत मुश्किल है कि सरकार द्वारा उठाया गया कदम महत्वाकांक्षी न होकर नागरिकों और सविधान की रक्षा के लिये है। यहां प्रशासन और न्यायालय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती हैl यह और भी घातक तब हो जाती है जब न्यायालय औऱ प्रशासन के जिम्मेदार लोग सरकार की सेवा में लग जाने को आतुर होते हैं। वर्तमान में पुलिस का प्रदर्शन से निपटना सराहनीय है लेकिन पुस्कालय में जाकर प्रदर्शन करने वालों को पकड़ने की बजाए मारना उसकी कमजोरी को दिखाता है। सीमित जगहों पर हो रहे प्रदर्शनों को फैलने से रोकने में असमर्थ पुलिस को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है। विरोध प्रदर्शन होंगे और पुलिस और सरकार दोनो को ही मनुष्य होने के प्रमाण देने होंगे। ताकत से केवल जानवर ही रोंके जा सकते हैं मनुष्य नही।

 

पुलिस की कार्यशैली के प्रमाण हमें इतिहास में हजारों मिलते हैं। अन्ना के आंदोलन को दबाने का प्रयास हो या बाबा रामदेव को रामलीला मैदान से उठाना।हैदराबाद इनकाउंटर हो या उत्तर प्रदेश में इंसपेक्टर की जान जाना। सभी पुलिस की असफलता के उदाहरण है। पुलिस प्रर्दशनकारियों को अपराधी की तरीक़े से नियंत्रण करने की कोशिश करती है और अपने बनाये जाल में खुद फंस जाती है। जिसका दुरुपयोग सभी राजनीतिक दल पूरी निपुणता के साथ करते हैं। पुलिस ने यदि जामिया विश्विद्यालय को सही से नियंत्रित किया होता तो इस आंदोलन को दूसरे विश्विद्यालयों में बढ़ने से रोक सकते थे। यहां यह निर्णय लेना मुश्किल है कि यह पुलिस की विफलता थी या राजनीतिक दलों की मिलीभगत। किसी को अपनी ताकत दिखाने का मौका था तो किसी को अपनी कुशलता। समस्या थी तो केवल पुलिस और जनता के लिये। पुलिस को जिनकी रक्षा करनी थी उसे ही मार रही है और जनता जिसे शांति पूर्ण माहौल में रहना चाहिए, विरोध या पक्ष में आंदोलन कर रही है।

 

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में संसद और देश का संविधान कभी इतना कमजोर नहीं हो सकता कि किसी की नागरिकता छीन ले लेकिन यह इसमें कहा जा रहा है। सरकार जिसका दायित्व सबके साथ चलकर कानून बनाने का होना चाहिए वहाँ राजनीतिक महत्वाकांक्षा मजबूत सरकार और समर्पित व्यक्ति के प्रमाण खोजने की कोशिश हो रही है। सबसे दुख की बात यह है कि दोनो ही लोग अपनी ताकत को दिखाने की कोशिश कर रहे है, पुलिस औऱ प्रशासन बीच मे दबा हुआ है। जिसकी जहाँ सरकार है वहां उसको रियायत दे रहा है और जनता जो किसी राजनीतिक विचारधारा से संबंधित नहीं है रोज अग्निपरीक्षा दे रही है। आज देश का हर व्यक्ति एक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का अंग बन रहा है। कोई राजनीतिक विचारधारा का अंग है, कोई प्रगतिवादी बनकर मोदी का विरोधी बन रहा है तो कोइ सरकार और मोदी समर्थन करके देशप्रेम दिखाने की कोशिश में लगा है।

 

किसी भी देश की नागरिकता भावनात्मक और संप्रभुता दोनों ही मायने में महत्वूर्ण होती है। पिछले तीन दशकों से विश्व हमें एक बाजार के रूप में देख रहा था और हम अपनी जनसंख्या को अपना सबसे मजबूत पक्ष बना रहे थे। काफी हद तक सफल भी हुए, परिणाम लोगो को सुविधाएं मिली बाजार विकसित हुए और सड़क से लेकर संस्थान भी विकसित हुए। गरीब देशों ने भारत को अपना रोल माडल बनाने की कोशिश भी की, इसी कड़ी में वहां के नागरिकों में जिसको भी मौका मिला भारत में प्रवेश करने लगा। इसी समय कई पडोसी देशों की आर्थिक स्थिति खराब हुई और उन देशों के वो सभी नागरिक जो अपने देश से बाहर रोजगार चाह रहे थे उन्हें भी भारत में संभावना नजर आने लगी और वो सभी भारत आने लगे ।

पिछले तीन दशकों में विश्व में जितना आर्थिक विकास महत्पूर्ण रहा है उतना ही अतिवाद ने भी विकास किया है। समय के साथ बौद्ध धर्म के अनुनायियों ने समय के साथ जीना सीखा और अंजाने में ही पूरी तरह पाश्चात्य संस्कृति को आत्मसात कर गए। रूस के विघटन के बाद धर्म निरपेक्ष संस्कृति भी मुख्य धारा से अलगा हो गई और समाजवाद की परिकल्पना भी लगभग अंतिम सांसे लेने लगी। मुस्लिम संगठनों ने कब धर्म की आड़ में आतंकवाद से ग्रस्त हो गए पता ही नहीं चला और विकासशील मुस्लिम देश अविकसित होने के साथ ही अपने नागरिकों के लिए ही दोयम दर्जे की श्रेणी में आ गए। परिणाम बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान, म्यांमार आदि देशं के नागरिक भारत के अनाधिकृत रूप से प्रवेश करने लगे।

 

लोकतंत्र में वोट का लालच सत्ता को किसी भी हद तक गिरा सकता है। वर्तमान स्थिति इसी का परिणाम है, पिछली सरकारों ने धर्मनिरेक्षता के नाम पर गैर हिन्दूओं का ध्रुवीकरण किया और वर्तमान सरकार हिंदुओ का ध्रुवीकरण कर रही हैं। सामाजिक संगठन भी इस सच को बताने की बजाय राजनीतिक दलों के बनाए जाल में फंस गए और एक ऐसा आंदोलन कर रहे हैं जहां से वापस आना न उनके लिए सम्भव है न ही राजनीतिक संभावनाओं के लिए। बची खुची सरकार द्वारा इसेसे शक्ति से निपटने के प्रशासनिक क़दम उन सभी संभवनोओ को खत्म कर र हे हैं। कोई भी इस समय ऐसा कोई काम नहीं कर रहा जिससे अविश्वास कम हो। राजनीतिक महत्वकांक्षा बिल में संशोधन और आन्दोलन करने वाली से बात करना तो दूर इसे एक राजनीतिक हथकंडे बना कर सभी उपयोग करना चाह रहे है।

 

बिल की आश्यकताओं को नजरअंदाज करना जहां अनाधिकृत नागरिकों का हौसला बड़ाएगी जो निश्चय ही आंतरिक सुरक्षा के लिए ख़तरा है। वर्तमान में जनसंख्या रजि्टर का डर आसाम का उदाहरण देकर यहां के नागरिकों में अविश्वास को बढ़ाएगा। आज सरकार, सामाजिक संगठनों, प्रबुध नागरिकों, राजनीतिक दलों सभी की जिम्मेदारी है कि मुद्दे की गम्भीरता को समझे और माननीय प्रधानमंत्री जी बिना राजनीतिक महतवाकांक्षा के इसमें नेतृत्व करें। तभी वर्तमान में फिर से विकास को ध्रुव मानकर राजनीति का विकल्प शुरु हो पायेगा।