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गरीबों की सरकारी मदद के मायने

किसी भी राज्य की जिम्मेदारी दो प्रकार की होती है, पहली अपने राज्य की कानून व्यवस्था को दुरुस्त करे और दूसरी सभी को बराबरी के अधिकार को लेकर विभिन्न सिद्धान्तों एवं गतिविधियों की समय समय पर सभी विचारकों द्वारा की गई है। सभी विचारकों नें समयानुसार कमजोर को राज्य द्वारा दी गयी आर्थिक और सामाजिक मदद की वकालत की है।

सामाजिक मदद में समय के अनुसार मदद करने की बात गई है। हम सभी को यह याद होगा कि स्वतंत्रता के बाद चकबंदी की गई थी और भूमिहीन लोगों को भूखंड दिया गया था। सरकार ने समयानुसार उद्योग लगाने की बात हो या उसको चलाने की बात। यह मदद सरकार द्वारा कभी सस्ती जमीन उपलब्ध कराकर या कर में छूट देकर की गई तो कभी  कभी आर्थिक सहायता देकर। कभी विरोध की आवाज नही आई। जमीन अधिग्रहण के तरीकों पर जरूर बात हुई और समयनुसार उनमे बदलाव भी किया गया। बहुत सारी कहानियों ने इस विषय मे सच कोसाबित किया हो सकती हैं जिसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयास हों या सरकारी अधिकारियों की कर्तव्यपरायणता या न्यायालय द्वारा समय समय दिये गये आदेश। व्यवस्था और व्यक्ति की परिभाषाओं की अपनी स्वीकृति अस्वीकृति होसकती है लेकिन विरोध का यह रूप कभी नही दिखा जो वर्तमान में दिख रहा है।

वर्तमान सरकार या पहले की सरकार या भविष्य में आने वाली सरकार सभी की जिम्मेदारी सामाजिक मुद्दों पर अलग अलग समयनुसार हो सकती है लेकिन सामाजिक कल्याण की भावना से अलग कभी नही हो सकती है। बीसवी सदी में भारत सरकार ने सामाजिक कल्याण की भावना की अपनी मुख्य जिम्मेदारी मानते हुए मनरेगा, खाद्य गारंटी कानून, मद्यन्तर भोजन आदि योजनाओं को शुरू किया। निश्चित तौर पर ये सारी योजनाएं उस तबके के लिए थी जों कर नही देता, बाजार की अधिकांश चीजों को नही खरीदता है। लेकिन उन सारे बाजारों में जहां व्यापार और व्यपारी अपनी चीजों को बेंचता है वहाँ यही वर्ग काम करता है। वो सारे लोग जो कर देते है उनके यहाँ घर या कार्यालय को सजाने के काम यही वर्ग करता है, दुकान या कारखाना यही वर्ग काम करता है। मुझे कोई अतिश्योक्ति नही लगती अगर मैं कहूं कि वो इसीलिए इस स्तर की आय कर पाते हैं  कि उन्हें कर देना पड़े क्यूँकि यह तबका जिसे आज आर्थिक मदद की जरुरत उसके यहां काम करता है जिसे सामाजिक सुरक्षा के साथ साथ उसे आर्थिक स्वतंत्रता की आज जरूरत है।

यहां एक छोटी सी कहानी जोड़ना उचित होगा वो यह है “नौकर ने अपने मालिक की नई कार देखकर खुश होते हुए मालिक को बधाई दी। मालिक ने बड़ी शालीनता से कंधे पर हाँथ रखा और बोला ऐसे ही मेहनत करते रहो जल्दी एक औऱ अच्छी कार तुम्हारे छोटे साहिब के लिये जल्दी खरीदूँगा।“ यहाँ यह जरूरी होगा कि कार खरीदने से लेकर उसमें आने वाले सभी खर्चे और बचत, नियमानुसार कर प्रणाली में आयेंगे और सरकार हिस्सा नियमानुसार निकलेगी। यहां मालिक नौकर से इस बात जे लिये मदद भी मांग रहा है। मुझे तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नही लगती कि इस कर व्यवस्था में उस नौकर के साथ मे उन सभी लोगों का योगदान है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मालिक की आय बढ़ाते है।

भारतीय सभ्यता की एक बहुत बड़ी कमजोरी है कि उसकी वैश्विक धारणा हरदम व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रभावित हो जाती है और व्यापक सोंच रखने के बजाय दिखाई देने वाली बात पर ही विश्वास करने लगती है। हीरे की कीमत जौहरी की कलात्मकता और कर्मठता दोनो पर उतना ही निर्भर करती है जितना उसको तराशने वाली मशीनों पर । हमारे समाज मे गरीबों हाल हीरा तराशने में उपयोग होने वाले उपकरण की तरह ही है। वो कही हमे सुंदर दिखाने के लिये काम करते है, कभी हमारे घर सजाने कभी कार्यालय  की हर किसी चीज को उपयोग से पहले साफ करके उस लायक बनाते है जिसे तथाकथित लोग सभ्य कहते हैं कि “अब अच्छा है” . यह वर्ग आपके लिए दिल से सहारा देता है। सरकार की इस वर्ग को स्वस्थ और कर्मठ दोनों ही बनाकर रखना पड़ेगा अन्यथा आज नही तो कल सब रोज की व्यवस्थाओं को बनाने में लगे होंगे क्योंकि समय और ताकत औसतन सबमें बराबर होती है अंतर है तो कुशलता को जी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से किसी रानू, रेणु या रामू के पसीने पर निर्भर करती है।

यह योजना आलोचना का शिकार मुख्य रूप से उस वर्ग से आ रही है जो आयकर देता है। तो मेरे मित्रों सरकार आपके आयकर से नही चलती है। सरकार के अपने स्त्रोत है जिसमे गैरकानूनी तरीके से जमा की गयीं या संम्पत्ति को जप्त करके ली जाती है, जनता से वसूल किया गया अर्थदंड, अधिभार, दंड, सज़ा आदि, विभिन्न व्यापारिक गतिविधियों से अर्जित कर, अपने स्रोत से की गई आय आदि। आप कितना योगदान करते हैं किसी से छिपा नहीं है। जिंदगी जीने की हर गतिविधि किसी न किसी कर के प्रति उत्तरदायी हो जाती है और हर गरीब की अपनी जिंदगी है चाहे खाने के सामान खरीदने की बात हो या बिजली और गैस में लगने वाला कर हो या इन सबको बेंचने वाले लोगों का  निकाय या संस्थागत कर हो या आयकर। अगर यह वर्ग अपनी गतिविधियों में रुक गया तो न आपकी आय होगी न आपका आयकर।

सरकार की जो अपनी जिम्मेदारी है वो कर रही है। थोड़ा उदार होइये और अपने घर मे आने वाले व्यक्ति को स्वस्थ और सुंदर देखकर मुस्कराये गरीब की आय और उनको स्वीकार करिये आपकी भी कार्यकुशलता बढ़ेगी और सरकार की आय बढ़ेगी।